केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही ऐसा हे, जो हमारे दुः खो को सदा के लिए नष्ट कर सकता है। - स्वामी विवेकानंद



नवजात मृतकों की आत्मा की शांति के लिये कपड़े की दुल्हन से शादी
04/15/2013 06:11PM

नन्ही बिटिया के हाथों में कपड़े की गुड़िया होना और फिर पड़ोस की सहेली के गुड्डे से उसका ब्याह रचाना कोई नई बात नहीं है. लेकिन मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले में कम उम्र में मरने वाले लोगों की आत्मा की शांति के लिए कपड़े की गुड़िया से ब्याह रचाने का चलन है. जिले के विकासखंड ब्यावरा के कटारियाखेड़ी ग्राम में गुरूवार को इसी तरह की एक बारात में दुल्हे को सजाकर ग्राम में बारात निकाली गई लेकिन जिस दुल्हन के साथ उसका ब्याह रचाया गया, वह कपड़े की बनी थी. कंजर समुदाय में छोटी उम्र में मरने वाले लोगों की आत्मा की शांति के लिए इस तरह का ब्याह रचाने की परंपरा है. इस परंपरा में मृतक के परिजन को दूल्हा बनाया जाता है और पूरे रस्मों रिवाज के साथ उसकी बारात निकाली जाती है. फर्क सिर्फ इतना है कि उसका ब्याह कपड़े की दुल्हन से होता है. इस परंपरा के तहत गुरूवार को आयोजित इस विवाह समारोह में शादी की परंपराओं की शुरुआत की गई जिसमें हल्दी, बारात के साथ ही परिजनों द्वारा नेग देने की परंपरा का निर्वहन किया गया. विवाह समारोह में परिजन ग्वालियर, गुना, बैरसिया ओर राजगढ़ जिले से शामिल होने पहुंचे थे. इस अनोखी शादी में रस्मों के लिये फेरों के स्थान पर एक यज्ञ का आयोजन किया गया जिसमें कपड़े की बनी दुल्हन को बिठाते हुए उसे मंगल सूत्र और कपड़े चढ़ाने की रस्म अदायगी के साथ ही थाली में सजे सभी सामान को यज्ञ में डाला गया. परिजनों के अनुसार ऐसा करने से मृतकों को आत्मा को शांति मिलती है. मृतक की मां गीताबाई के अनुसार विवाह में करीब डेढ लाख रुपए का खर्च आया, जिसमें भोजन से लेकर बैंड, साउंड, टेंट आदि शामिल है. मृतक के भाई और शादी में दूल्हा बने रामनरेश ने बताया कि नवजात अवस्था में मरने वाले लोग संसार में आने के बाद भी दुनिया नहीं देख पाते और न ही परिवार में समृद्धि आ पाती है. ऐसे में मृतकों के परिजन आपस में रिश्ता तय कर पूरे रीति-रिवाजों के साथ उनका विवाह कराते है ताकि उनको शांति मिल सके. इसमें लडका तो मृतक का परिजन होता है लेकिन लड़की के रुप में कपड़े की दुल्हन रखी जाती है.

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